देव उठनी एकादशी, जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी ग्यारस भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण एकादशी मानी जाती है। यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। यह तिथि आमतौर पर अक्टूबर या नवंबर महीने में आती है। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं और धार्मिक दृष्टि से सभी शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत होती है।
देव उठनी एकादशी का महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि को “चातुर्मास” कहा जाता है, जो लगभग चार महीने तक चलता है। इस दौरान विवाह, यज्ञ, गृहप्रवेश, संस्कार आदि सभी मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं।
कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते हैं। इसी कारण इस दिन को देवोत्थान या देवप्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। भगवान विष्णु के जागने के साथ ही सारे देवता भी जाग्रत हो जाते हैं, और धर्म, कर्म तथा शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत होती है।
देव उठनी एकादशी का महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि को “चातुर्मास” कहा जाता है, जो लगभग चार महीने तक चलता है। इस दौरान विवाह, यज्ञ, गृहप्रवेश, संस्कार आदि सभी मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं।
कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागते हैं। इसी कारण इस दिन को देवोत्थान या देवप्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। भगवान विष्णु के जागने के साथ ही सारे देवता भी जाग्रत हो जाते हैं, और धर्म, कर्म तथा शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत होती है।
देव उठनी एकादशी की पूजा-विधि
इस दिन प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लिया जाता है। भगवान विष्णु की पीतांबर वस्त्रों में पूजा की जाती है। उन्हें तुलसी पत्र, पंचामृत, फूल, दीपक और भोग अर्पित किया जाता है।
रात के समय “ऊठो देव ऊठो, चार मास सोए रहे” कहते हुए भगवान विष्णु को जागृत किया जाता है। कई जगह मिट्टी या गोबर से शेषनाग, विष्णु और लक्ष्मी की प्रतिमाएं बनाकर पूजा की जाती है। भक्तजन पूरी रात कीर्तन, भजन और जागरण करते हैं।


